
जालंधर 31 अगस्त (धर्मेन्द्र सौंधी) : महानगर में अवैध निर्माण के कारण सरकार को होने वाले राजस्व नुकसान का मुद्दा लगातार गंभीर होता जा रहा है। शहर का शायद ही कोई ऐसा विधानसभा हलका हो, जहां अवैध निर्माण को लेकर शिकायतें सामने न आती हों। नगर निगम की ओर से कई मामलों में नोटिस जारी किए जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि नोटिस के बाद भी कार्रवाई जमीन पर क्यों नजर नहीं आती? ऐसा ही मामला आदर्श नगर में सामने आया है। आरोप है कि रिहायशी परिसर को तोड़कर दो दुकानों/शोरूम का विस्तार किया गया और बाद में वहां व्यावसायिक गतिविधियां शुरू कर दी गईं। बताया जाता है कि उक्त परिसर को वर्ष 2025 में सील भी किया गया था, इसके बावजूद दोबारा निर्माण और दुकानें चलने का मामला सामने आया है। मामले में नगर निगम की ओर से 30 जून 2026 को अंतिम नोटिस जारी किया गया। नोटिस में रिहायशी नक्शे के आधार पर इमारत निर्माण की शिकायत का उल्लेख करते हुए संबंधित पक्ष को तीन दिन के भीतर आवश्यक दस्तावेज निगम कार्यालय में पेश करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद यदि आज भी दुकानें संचालित हो रही हैं, तो बड़ा सवाल यह है कि नोटिस और सीलिंग के बाद भी व्यावसायिक गतिविधियां कैसे जारी हैं?

क्या संबंधित अधिकारियों ने मौके का दोबारा निरीक्षण किया? क्या सीलिंग के बाद निर्माण या उपयोग में बदलाव की अनुमति दी गई? और यदि नहीं, तो अब तक प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मामले में एटीपी और बिल्डिंग इंस्पेक्टर की भूमिका भी जांच का विषय बनती है। नगर निगम को स्पष्ट करना चाहिए कि नोटिस जारी करने के बाद कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची और सरकारी राजस्व को संभावित नुकसान से बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए।
अब देखना यह है कि नगर निगम इस मामले में केवल नोटिस तक सीमित रहता है या जमीनी स्तर पर कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधि पर रोक लगाता है।










